सिद्धार्थनगर। यूपी के जनपद सिद्धार्थनगर के मिठवल ब्लाक के महुआ गांव से सामने आया एक सनसनीखेज मामला अब पूरे जनपद में चर्चा का विषय बनता जा रहा है। गांव निवासी हरिश्चन्द्र चौधरी ने जिलाधिकारी को दिए गए विस्तृत शिकायती पत्र में आरोप लगाया है कि उनका दिव्यांग परिवार वर्ष 1991 से भूमाफियाओं और कुछ अधिकारियों/कर्मचारियों की कथित मिलीभगत का शिकार है। परिवार ने दावा किया है कि फर्जी वसीयत, फर्जी खसरा-खतौनी, चकबंदी आदेश और मुकदमों के जरिए उनकी जमीन और अधिकार छीने गए। इतना ही नहीं, न्याय की मांग को लेकर परिवार अब मुख्यमंत्री से मिलने लखनऊ रवाना हो चुका है।

परिवार का कहना है कि अब आखिरी उम्मीद मुख्यमंत्री दरबार से ही है। 1991 से शुरू हुआ उत्पीड़न हरिश्चन्द्र चौधरी के अनुसार, उनके बाबा जगमोहन की मृत्यु 1988 में हुई। इसके बाद परिवार की जमीन और संपत्ति को लेकर विवाद शुरू हुआ। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि—1991 में रामदीन की मृत्यु के बाद कथित फर्जी वसीयत के आधार पर भूमि अपने नाम करवा ली गई।

दिव्यांग रामअवध उर्फ गोबरी और उनकी मां को घर से निकाल दिया गया।1993 में संयुक्त गाटा संख्या 195 की फर्जी खतौनी बनवाकर बैंक से लोन लिया गया।2002 में फिर कथित फर्जी वसीयत न्यायालय में पेश की गई।2006 में चकबंदी से जुड़ा कथित फर्जी आदेश न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।परिवार का आरोप है कि कई बार जांच के बावजूद आज तक किसी जिम्मेदार व्यक्ति पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

धरना दिया, मुकदमे झेले, फिर भी नहीं मिला न्याय

शिकायत पत्र में उल्लेख किया गया है कि परिवार ने 2008 और 2020 में जिलाधिकारी कार्यालय पर धरना भी दिया। इसके बाद कार्रवाई का आश्वासन मिला, लेकिन परिवार का दावा है कि “सिर्फ कागजों में कार्रवाई हुई।”परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि विरोध करने पर उनके ऊपर फर्जी मुकदमे दर्ज कराए गए और उन्हें जान से मारने तक की कोशिश हुई। शिकायत में यह गंभीर दावा भी किया गया है कि गरीबों की मदद करने वाले डॉ. राजकपूर चौधरी की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी।

प्रशासनिक रिपोर्ट में क्या कहा गया?

मामले से जुड़े IGRS और राजस्व विभाग की रिपोर्ट में कहा गया कि यह विवाद न्यायालय से संबंधित है और सक्षम न्यायालय में वाद दायर कर समाधान प्राप्त किया जा सकता है। स्थानीय स्तर की जांच में अधिकारियों ने इसे “न्यायालयीय प्रकृति” का मामला बताया।हालांकि पीड़ित परिवार का आरोप है कि यही बात कहकर वर्षों से कार्रवाई टाली जा रही है।चकरोड और रास्ते का विवाद भी जुड़ामामले में केवल जमीन ही नहीं बल्कि चकरोड, रास्ता और नाली विवाद भी जुड़ा हुआ है। परिवार ने आरोप लगाया कि गांव में उनके खेत और घर तक जाने वाले रास्ते पर अतिक्रमण किया गया, जिससे आवागमन और खेती प्रभावित हो रही है। इस संबंध में भी कई बार तहसील और जिला प्रशासन को प्रार्थना पत्र दिए गए।

पोस्टर लगाकर सरकार से मांगा न्याय

परिवार ने विरोध स्वरूप पोस्टर जारी कर लिखा—“हम परिवार सन 1991 से काले कारनामों से फंसे हैं… आपके दरबार आ रहे हैं… काले कारनामों का अंत होगा या हम परिवारों का।”यह पोस्टर सोशल मीडिया और क्षेत्र में तेजी से वायरल हो रहा है।

बड़ा सवाल – क्या होगी निष्पक्ष जांच?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि—क्या फर्जी दस्तावेजों और आदेशों की स्वतंत्र जांच होगी?क्या राजस्व और चकबंदी विभाग की भूमिका की जांच कराई जाएगी?क्या 34 वर्षों से न्याय की लड़ाई लड़ रहे इस परिवार को राहत मिलेगी?मामला अब प्रशासनिक दफ्तरों से निकलकर राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बनता जा रहा है। यदि मुख्यमंत्री कार्यालय इस प्रकरण का संज्ञान लेता है तो कई पुराने रिकॉर्ड और आदेशों की जांच दोबारा हो सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *