लखीमपुर खीरी जिले में जीएसटी गबन के मामले में दर्ज पांच एफआईआर की जांच कर रही साइबर थाना पुलिस ने गिरोह के चार आरोपियों को गिरफ्तार कर बड़ा खुलासा किया है। पूछताछ से पता चला कि गिरोह ने 300 फर्जी फर्में बनाकर उनके बिल तैयार करके बेचे। इन बिलों को खरीदने वाली दूसरी फर्मों ने आईटीसी क्लेम कर सरकार को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाया। ये फर्में यूपी से सटे पड़ोसी राज्यों के जिलों की भी हैं। कई संदिग्ध फर्मों को चिह्नित भी कर लिया गया है।

पुलिस ने यहां के ईसानगर थाना क्षेत्र के मिजापुर के राजू, सीतापुर के थाना तंबौर के बेहटा पकौड़ी निवासी अंकित द्विवेदी, वहीं के कोतवाली देहात क्षेत्र के गौरिया कला के धीरेंद्र सिंह और बाराबंकी के थाना रामनगर क्षेत्र के टिहुरकी के दीपक सिंह उर्फ धीमा को गिरफ्तार किया। गिरोह के अन्य 11 लोगों की तलाश की जा रही है।

गैंग के खिलाफ दर्ज हैं कई मुकदमा

सीओ सदर विवेक तिवारी (एएसपी) ने बताया कि इस गैंग के खिलाफ गौरीफंटा, खमरिया, मोहम्मदी और कोतवाली सदर में पहले से मुकदमे दर्ज हैं और उन्हीं की जांच साइबर थाना पुलिस कर रही है। पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि वे लोगों को झांसे में लेकर उनके आधार कार्ड, पैन कार्ड आदि दस्तावेज हासिल कर लेते थे। फिर उनसे फर्जी जीएसटी रजिस्ट्रेशन कराते थे।

गिरोह दो हिस्सों में बंटा हुआ है। एक हिस्से में दस्तावेज हासिल करने वाले लोग थे। राजू और धीरेंद्र का यही काम था। वहीं उससे ऊपर के लेवल पर फर्जी फर्म बनवाने वाले लोग थे। अंकित और दीपक इन्हीं में से हैं। अभी कोई सरगना चिह्नित नहीं हो सका है, सबका एक जैसा काम था। गिरोह फर्जी फर्म बनाने का काम सीतापुर के जहांगीराबाद और बिसवां थाना क्षेत्र में करता था।

ये हुई बरामदगी

पुलिस ने आरोपियों के पास से 37 सिम कार्ड, 26 चेकबुक, 16 पैन कार्ड, 20 आधार कार्ड, 21 किरायानामा स्टांप, 3 रबर स्टांप, 5 मोबाइल फोन, एक लैपटॉप, एक पेन ड्राइव, एक डिजिटल सिग्नेचर डिवाइस, 4 जीएसटी रजिस्ट्रेशन, 4 उद्यम रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, 3 पार्टनरशिप डीड, एक रिटायरमेंट डीड और 26,100 रुपये बरामद किए।

15 सदस्यीय गैंग, 11 की तलाश

जांच में सामने आया कि पूरे नेटवर्क में कुल 15 लोग सक्रिय थे। पुलिस ने चार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है, जबकि 11 आरोपी पकड़ से बाहर हैं। इनमें ज्ञानेंद्र, अनुज वर्मा, अम्मार, हरिओम शुक्ला, नेक आलम, नावेद मुस्ताक, अतुल सिंह, अंकित अग्रवाल, आशीष अग्रवाल, हिमांशु और सत्यम शामिल हैं।

बंटे थे काम, गांव-गांव से जुटाते थे दस्तावेज

गिरोह के प्रत्येक सदस्य की भूमिका तय थी। कुछ लोग फर्जी इनवाइस और ई-वे बिल तैयार करते थे, जबकि छह सदस्य गांव-गांव जाकर लोगों को ऋण और सरकारी योजनाओं का झांसा देकर दस्तावेज जुटाते थे। एकत्र दस्तावेज सीतापुर के अतुल सिंह, अंकित अग्रवाल और आशीष अग्रवाल को दिए जाते थे, जिनके निर्देश पर फर्जी फर्में तैयार होती थीं।

काम के बाद जला देते थे कागजात

आरोपियों ने बताया कि काम पूरा होने के बाद सबूत मिटाने के लिए कागजात जला दिए जाते थे। जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल के लिए सभी दस्तावेजों का डाटा पेन ड्राइव में सुरक्षित रखा जाता था।

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